Shiksha ki Prakriti

शिक्षा की प्रकृति (Shiksha ki Prakriti)

शिक्षा के अर्थ एवं परिभाषा को समझने के बाद हम यह समझ सकते हैं कि शिक्षा की प्रकृति (Shiksha ki Prakriti) बहुत जटिल है। शिक्षा जीवन पर्यन्त चलने वाली क्रिया है हम अपने सम्पूर्ण जीवन काल में  शिक्षा ग्रहण करते रहते हैं। शिक्षा और सभ्यता का आपस में बहुत गहरा सम्बन्ध है जिसका हमारे जीवन में असर पड़ता है। शिक्षा ही एक मात्र ऐसा पथ है जिस पर चलकर हम सद-मार्ग एवं  तरक्की की ओर बढ़ सकते हैं। शिक्षा की सहायता से ही हम अपनी सभ्यता एवं संस्कृति का संरक्षण एवं विकास कर सकते हैं तथा अच्छा और बुरा पहचान सकते हैं।

शिक्षा की प्रकृति (Shiksha ki Prakriti) को निम्नवत दर्शाया गया है-

शिक्षा एक जीवन पर्यन्त चलने वाली प्रक्रिया है-

शिक्षा की प्रकृति (Shiksha ki Prakriti) का अध्यन्न करने से हमें पता चलता है कि शिक्षा एक जीवन पर्यन्त चलने वाली प्रक्रिया है।जीवन पर्यन्त हम शिक्षा ग्रहण करते रहते हैं तथा हमारे जीवन काल में हमारे द्वारा ग्रहण की गयी शिक्षा हर मुकाम में हमारे काम आती है। शिक्षा जन्म से लेकर मृत्यु तक हमारे साथ होती है तथा अपने जीवन काल में सदैव हम कुछ ना कुछ सीखते रहते हैं।

शिक्षा एक व्यवस्थित प्रक्रिया है-

व्यवस्थित प्रक्रिया से तात्पर्य यह है कि शिक्षा एक निश्चित मानदंडों पर कार्य करती है। इसकी संरचना पूर्व निर्धारित होती है। शिक्षा का एक ढांचा तैयार किया जाता है तथा उस  ढांचे के अनुसार विभिन्न संस्थान इसका अनुसरण करते हैं।

शिक्षा व्यक्ति और समाज का विकास है-

शिक्षा से न केवल किसी व्यक्ति विशेष का अपितु पूरे समाज का विकास होता है। एक शिक्षित व्यक्ति अपने आस-पास रहने वाले समाज के लोगों को भी सदाचार एवं सद-व्यवहार की शिक्षा देता है। एक शिक्षित व्यक्ति अपने साथ-साथ समाज को भी विकास की ओर ले जाता है। अतः ये कहना गलत नहीं होगा की शिक्षा व्यक्ति और समाज का विकास है।

शिक्षा व्यवहार का संशोधन है-

हम शिक्षा के द्वारा किसी व्यक्ति विशेष के व्यवहार में परिवर्तन ला सकते हैं। शिक्षा एक ऐसा मंच है जिस पर हम व्यक्ति के व्यवहार में समाज तथा सामाजिक गुणों के आधार पर संशोधन कर सकते हैं।

शिक्षा एक प्रशिक्षण है-

शिक्षा एक प्रशिक्षण है से यह तात्पर्य है कि किसी भी कार्य को करने के लिए हमें प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है। मनुष्य की इन्द्रियों, मस्तिष्क एवं आदतों का निर्माण समाज के अनुसार किया जाता है तथा इस प्रकार के परिवर्तन या निर्माण व्यक्ति को प्रशिक्षण देकर लाये जाते हैं।

गतिशील प्रक्रिया-

शिक्षा एक स्थैतिक नहीं बल्कि एक गतिशील प्रक्रिया है। शिक्षा में समय के साथ सदैव परिवर्तन आते रहते हैं। यह समय और समाज की मांग के अनुसार बदलती रहती है। यह बालक में समय के अनुसार बदलाव एवं परिस्थिति के अनुसार परिवर्तन एवं विकास करती है। शिक्षा का सदैव कोई न कोई लक्ष्य रहता है तथा कोई भी व्यक्ति उस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए खुद को उसके प्रति पूर्ण रूप से समर्पित कर देता है।

शिक्षा सर्वांगीण विकास है-

शिक्षा व्यक्ति का सर्वांगीण विकास करती है। सर्वांगीण का अर्थ  पूर्ण रूप से अतः सर्वांगीण विकास का अर्थ हुआ व्यक्ति का पूर्ण विकास। शिक्षा व्यक्ति को मानसिक, शारीरिक एवं सामाजिक, हर तरह से विकसित करती है। 

उपसंहार

शिक्षा की प्रकृति (Shiksha ki Prakriti) के अध्ययन से पता चलता है कि शिक्षा मनुष्य के जीवन का एक मुख्य अंग है। मनुष्य को अपने इतिहास को संभाल कर रखने के लिए शिक्षित होना आवश्यक है। शिक्षा मनुष्य का सर्वांगीड़ विकास करती है। शिक्षा के माध्यम से ही मनुष्य अपनी संस्कृति से जुड़ा हुआ है।

शिक्षा की सहायता से ही मनुष्य यह सीख पाता है कि समाज में किस प्रकार से रहना चाहिए। मनुष्य के विकास के साथ-साथ हमारे समाज का भी विकास हुआ है जो कि शिक्षा की सहायता से संभव हो पाया है। अतः हम कह सकते हैं कि शिक्षा एक गतिशील प्रक्रिया है जो कि मनुष्य के साथ जीवन पर्यन्त चलती रहती है तथा हमारे इतिहास को संजो कर रखने में सहायक सिद्ध होती है।

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