प्राचीन काल के मानचित्र (Prachin Kaal ke Maanchitr)

मानचित्रकला के इतिहास अर्थात प्राचीन काल के मानचित्र (Prachin Kaal ke Maanchitr) की बात करें तो मानचित्र कला को उतना ही पुराना माना जाता है जितना की मनुष्य का इतिहास। मनुष्य ने शुरू से ही मानचित्र का प्रयोग करना शुरू कर दिया था। मनुष्य को स्थानों की जानकारी रखने के लिए मानचित्र की आवश्यकता पड़ती थी। प्राचीन काल के मानचित्रों में हम 400 ई. तक के मानचित्रों को सम्मलित करते हैं। प्राचीन काल के मानचित्रों (Prachin Kaal ke Maanchitr) को हम निम्न 5 भागों में विभाजित कर सकते हैं।

1. प्राचीन आदिम मानचित्रकला
2. ग्रीक मानचित्रकला
3. रोमन मानचित्रकला
4. चीनी मानचित्रकला
5. भारतीय मानचित्रकला

प्राचीन आदिम मानचित्रकला (Prachin Kaal ke Maanchitr)

मार्शल द्वीपवासियों का समुद्री चार्ट

प्राचीन काल (Prachin Kaal ke Maanchitr) में सर्वप्रथम मार्शल द्वीपवासियों के समुद्री चार्ट बहुत विख्यात थे। प्रशांत महासागर में मार्शल द्वीप में रहने वाले आदि वासियों द्वारा जल यात्रा के लिए बनाये गए मानचित्र 19 वीं शताबदी तक प्रयोग में लाये गए। उन्होंने जलयात्रा चार्ट को बनाने के लिए ताड़ के पत्तों का प्रयोग किया।

अमेरिकन लोगों को रेड इण्डियन के नाम से भी जाना जाता है जिनके द्वारा बनाये गए मानचित्र कुछ भद्दे होते थे जिस कारण उन्हें एस्किमो मानचित्रों की श्रेणी में नहीं रखा जाता था।
एज़टेकों के द्वारा बनाये गए मानचित्र एस्किमो प्रजाति के लोगों के द्वारा बनाये गए मानचित्रों के विपरीत थे। जहां एस्किमो प्रजाति के लोगों के मानचित्र बनाने का आधार स्थलाकृतिक विवरण था वहीं एज़टेकों के मानचित्र ऐतिहासिक घटनाओं के चित्रण पर आधारित थे। एजटेक मानचित्र में प्राकृतिक चिह्नों का प्रयोग करते थे।

संसार के सबसे प्राचीनतम मानचित्र की बात करें तो बेबीलोन को संसार का सबसे पुराना मानचित्र माना जाता है। साक्ष्य के अनुसार बेबीलोन के मानचित्र की आयु लगभग 4500 वर्ष है। बेबीलोन का मानचित्र बेबीलोन से लगभग 300 किलोमीटर उत्तर में स्थित गा सुर नामक नगर के उत्खनन में प्राप्त हुआ था जो की 8 सेंटीमीटर लम्बी तथा 7 सेंटीमीटर चौड़ी आयताकार मिटटी की टिकिया में बनाया गया था।

प्राचीन आदिम मानचित्रकला में मिस्र के लोगों के द्वारा बनाये गए मानचित्रों का अपना अलग महत्व है। साक्ष्य प्रमाणों के आधार पर यह माना जाता है कि सर्वप्रथम नील नदी की घाटी तथा डेल्टा में भू-सर्वेक्षण का कार्य प्रारम्भ हुआ था। ईशा से 1300 वर्ष पूर्व रेम्सेस द्वितीय ने अपने राज्य का क्रमबद्ध सर्वेक्षण करवाया था। भू-सर्वेक्षण द्वारा प्राप्त परिणामों का प्रयोग करके यूनानी विद्वान इरेटॉस्थेनीज़ ने पृथ्वी की परिधि की गणना की थी।

ग्रीक मानचित्रकला (Prachin Kaal ke Maanchitr)

मानचित्रकला में यूनानी विद्वानों का कार्य अद्वितीय रहा है। सर्वप्रथम यूनानी भूगोलवेत्ताओं ने ही पृथ्वी के आकार एवं उसके गोलीय आकृति को ज्ञात किया था। यूनान के विद्वानों ने ही सर्वप्रथम पृथ्वी पर अक्षांश एवं देशांतर रेखाओं का विकास किया एवं प्रक्षेपों का निर्माण किया। पृथ्वी पर भूमध्यरेखा, उष्ण कटिबंध व ध्रुवों की स्थिति बताने का श्रेय भी यूनानी विद्वानों को ही प्राप्त है।
मानचित्र कला में यूनान के कुछ मुख्य विद्वानों का योगदान नीचे बताया गया है।

अनेग्जीमेण्डर – ये एक यूनानी दार्शनिक थे। इन्होनें अपने अधिकतर कार्य मिलेटस में रहकर किये थे अतः इन्हें मिलेटस का अनेग्जीमेण्डर भी कहा जाता है। इन्होनें अपने समय के ज्ञात संसार का मानचित्र बनाया था जिसमें उन्होनें भूमध्य सागर के तटवर्ती क्षेत्र एवं दक्षिणी एशिया के कुछ भागों को दर्शाया था। इस मानचित्र के आधार पर उन्हें संसार का प्रथम मानचित्र निर्माता कहा जाता है।

हैकेटियस (500 ई पूर्व के लगभग)हैकेटियस भी मिलेटस के निवासी थे तथा इन्हें भूगोल की सर्वप्रथम पुस्तक ‘पेरिओड्स‘ लिखने का श्रेय प्राप्त है। वे पृथ्वी को चपटी तथा तस्तरी के समान वृताकार मानते थे। इन्होनें पृथ्वी का केंद्र भाग ग्रीस को माना था।

हैरोडोटस (485 – 425 ई पूर्व)हैरोडोटस एक प्रसिद्ध मानचित्र कार, इतिहासकार एवं भूगोलवेत्ता थे। यूनानी मानचित्रकला के बारे में अधिकांश ज्ञान के श्रोत हेरोडोटस एवं स्ट्राबो के द्वारा लिखित सामग्री से ही प्राप्त हुए हैं। हैरोडोटस के अनुसार अरिस्टागोरस ने स्पार्टन्स को जो कि मिलेटस के थे, एक कांसे की टिकिया दिखाई थी जिसमें सम्पूर्ण पृथ्वी की परिधि, समस्त सागर एवं नदियाँ अंकित थीं। हैरोडोटस ने उस समय का ज्ञात संसार का मानचित्र बनाया था जिसमें उसने भूमध्य सागर के समीप स्थित यूरोप, एशिया तथा अफ्रीका के भाग प्रदर्शित किये थे।

इरेटॉसथेनीज़ (276-196 ई पूर्व) – इन्हें भूगोल का जनक भी कहा जाता है। भूगोल शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग इनके द्वारा ही किया गया था। सर्वप्रथम पृथ्वी की परिधि मापने का श्रेय भी इन्हीं को प्राप्त है।

हिप्पारकस (150 ई पूर्व) – इन्होने इरेटॉसथेनीज़ के द्वारा बनाये गए अक्षांश एवं देशांतर रेखाओं के असमान जाल के स्थान पर समान दुरी के अक्षांश-देशांतर रेखाएं बनाने का सुझाव दिया। इन्होने 11 अक्षांश रेखाएं एवं देशांतर रेखाओं की गणना के लिए एक नई विधि- चन्द्र ग्रहणों के समकालिक वेधों को लेने का सुझाव दिया।

क्रेटस – इन्होनें सर्वप्रथम पृथ्वी का ग्लोब बनाया था जिससे दोनों अमेरिकाओं तथा ऑस्ट्रेलिया के पूर्व ज्ञान से प्रतिध्रुवों या टेरा ऑस्ट्रेलिस नामक महान दक्षिणी महाद्वीप की विचारधारा का सूत्रपात हुआ था।

पोसिडोनियस (135-50 ई पूर्व) – इन्होनें रोड्स से अलेग्ज़ेंड्रिया तक की दुरी तथा केनोपस नक्षत्र की ऊँचाई के आधार पर पृथ्वी की परिधि मापी थी। हिप्पारकस व टॉलेमी के मध्य का काल पोसिडोनियस काल के नाम से जाना जाता है।

क्लॉडियस टॉलेमी (90 – 168 ईसवी) – टॉलेमी को अलेग्ज़ेंड्रिया का क्लॉडियस टॉलेमी भी कहा जाता था। टॉलेमी की प्रशिद्ध पुस्तक ज्योग्राफिया 8 खण्डों में विभाजित थी। जिसके प्रथम खंड में सैद्धांतिक नियम एवं ग्लोब बनाने की तकनीकों के बारे में बताया गया है। दूसरे से आठवें खण्ड में लगभग 8000 से अधिक स्थानों के नाम तथा उनके अक्षांश एवं देशांतर लिखे गए हैं। आठवें खण्ड में मानचित्रकला, गणित भूगोल एवं प्रक्षेपों व खगोलीय वेधों के नियमों एवं विधियों के बारे में बताया गया है।

रोमन मानचित्रकला (Prachin Kaal ke Maanchitr)

ग्रीस के पतन के साथ-साथ रोमन के साम्राज्य का विस्तार होने लगा था जिसका ग्रीस मानचित्रकला में बहुत गहरा प्रभाव पड़ा। रोमन साम्राज्य का एकमात्र लक्ष्य अपने साम्राज्य की सीमाओं का विस्तार करना और अन्य राज्यों को जीतना था। एक राज्य से दूसरे राज्य में जाने के लिए तथा देश-विदेश में व्यापार के लिए उस समय के मार्ग एवं मार्ग के बीच की दुरी का ज्ञान होना आयश्यक था। अतः रोमन काल में क्रियात्मक एवं व्यावहारिक मानचित्रों के निर्माण में बल दिया गया जिस से एक स्थान से दूसरे स्थान में जाना आसान हो सके।

मानचित्रकला में रोमन के मारकस विपासेनिअस एगरिप्पा का नाम विशेष उल्लेखनीय है। इन्होनें 12 ई. पूर्व में प्रसिद्ध ऑरबिस टेरारम (संसार का सर्वेक्षण) मानचित्र तैयार किया था। इस मानचित्र में एशिया, अफ्रीका तथा यूरोप, तीनों एक दूसरे से समरूपता रखते हैं। प्यूटिंजर टेबुल भी एक प्रकार का मानचित्र है जिसे रोमन ने बनाया था।

चीनी मानचित्र कला (Prachin Kaal ke Maanchitr)

देश के प्राचीन अध्ययन से पता चलता है कि चीन में ईशा से कई सौ वर्ष पूर्व मानचित्र बनाने का कार्य प्रारम्भ हो चुका था तथा प्रथम शताब्दी के पश्चात लगभग प्रत्येक भाग में मानचित्र बनाये जाने लग गए थे।

पि सियू (224 – 273 ई) – इन्हें चीनी मानचित्र कला का पिता कहा जाता है। इन्होनें मानचित्र कला के कई सिद्धांतों का प्रतिपादन किया था।

शिह चवँग (421 – 466 ई ) – इनके द्वारा बनाया गया काष्ठ मानचित्र बहुत महत्वपूर्ण था।

चिया शेन (730 – 805 ई) – शिह चवँग के बाद सबसे अच्छे मानचित्र कार में चिया शेन का नाम ही आता है। इन्होनें एशिया व उनके समीप के भागों का एक विशालकाय मानचित्र बनाया था जो कि 2.79 वर्ग मीटर का था।

भारतीय मानचित्रकला (Prachin Kaal ke Maanchitr)

भारतीय विद्वानों के द्वारा बनाये गए मानचित्र अब उपलब्ध नहीं हैं। किन्तु वैदिक काल (2500 – 1000 ई पूर्व) में लिखे गए वेदों, ग्रंथों, उपनिषदों आदि में पृथ्वी, नक्षत्र, सूर्य, चन्द्रमा, तारा मंडल तथा खगोलीय पिंडों के विवरण मिलने पर यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि पृथ्वी एवं खगोलीय पिण्डों के ज्ञान में भारतीय विद्वानों का ज्ञान यूनानियों से कई अधिक प्राचीन एवं उच्चस्तरीय था।

कुछ महत्वपूर्ण तथ्य

  • संसार का प्रथम मानचित्र निर्माता – अनेग्जीमेण्डर
  • मिलेटस का अनेग्जीमेण्डर – अनेग्जीमेण्डर
  • भूगोल की सर्वप्रथम पुस्तक लिखने का श्रेय – हैकेटियस
  • भूगोल की सर्वप्रथम पुस्तक – पेरिओड्स
  • भूगोल का जनक – इरेटॉसथेनीज़
  • सर्वप्रथम पृथ्वी का ग्लोब बनाया – क्रेटस
  • हिप्पारकस व टॉलेमी के मध्य का काल – पोसिडोनियस काल
  • अलेग्ज़ेंड्रिया का क्लॉडियस टॉलेमी – टॉलेमी
  • “ज्योग्राफिया” पुस्तक – टॉलेमी
  • ज्योग्राफिया 8 खण्डों में विभाजित थी
  • ऑरबिस टेरारम (संसार का सर्वेक्षण) मानचित्र तैयार किया – मारकस विपासेनिअस एगरिप्पा
  • प्यूटिंजर टेबुल – रोमन द्वारा बनाया गया एक प्रकार का मानचित्र
  • चीनी मानचित्र कला का पिता – पि सियू

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