मुदालियर आयोग के सुझाव

मुदालियर आयोग के सुझाव

मुदालियर आयोग के सुझाव- माध्यमिक शिक्षा आयोग जिसका गठन डॉक्टर लक्ष्मणस्वामी मुदालियर जी की अध्यक्षता में संपन्न हुआ। डॉक्टर लक्ष्मणस्वामी मुदालियर के अध्यक्षता में माध्यमिक शिक्षा आयोग का गठन हुआ अतः इसे मुदालियर आयोग के नाम से भी जाना जाता है। मुदालियर आयोग ने अपने प्रत्यावेदन में माध्यमिक शिक्षा के तात्कालिक दोषों का वर्णन किया, तत्पश्चात आयोग द्वारा माध्यमिक शिक्षा की कमियों तथा समस्याओं को दूर करने के लिए सुझाव दिए। आयोग द्वारा माध्यमिक शिक्षा के स्तर को बढ़ाने के लिए निम्न सुझाव दिए गए।

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प्रशासन तथा वित्त से संबंधित मुदालियर आयोग के सुझाव

आयोग द्वारा प्रशासन तथा वित्त से संबंधित सुझाव को चार श्रेणियों में विभाजित किया गया जो कि निम्नवत है-

1- प्रशासनिक संरचना

(i) केंद्रीय सलाहकार बोर्ड के समान प्रत्येक प्रांत में प्रांतीय सलाहकार बोर्ड की स्थापना की जाए।

(ii) जिन प्रांतों में अभी तक माध्यमिक शिक्षा बोर्ड का गठन नहीं हुआ वहां माध्यमिक शिक्षा बोर्ड का गठन किया जाए। प्रांत का शिक्षा निदेशक इसका पदेन अध्यक्ष होगा।

(iii) शिक्षा निदेशक का काम शिक्षा मंत्री को सलाह देना है, इसलिए उनका पद संयुक्त सचिव के बराबर होना चाहिए।

(iv) तकनीकी शिक्षा के लिए हर प्रांत में तकनीकी शिक्षा बोर्ड की स्थापना की जाए।

2- वित्त का संगठन
वित्त के संगठन के लिए आयोग ने निम्न सुझाव दिए

(i) माध्यमिक शिक्षा व्यवस्था के प्रसार एवं उन्नयन के लिए केंद्र सरकार द्वारा प्रांतीय सरकारों को आर्थिक सहायता देनी चाहिए।

(ii) माध्यमिक विद्यालयों को दिया जाने वाला दान आयकर मुक्त होना चाहिए।

(iii) सरकार द्वारा माध्यमिक विद्यालयों के लिए भूमि की व्यवस्था निःशुल्क होनी चाहिए।

(iv) माध्यमिक विद्यालयों द्वारा क्रय की गई सामग्री कस्टम अर्थात चुंगी मुक्त हो।

3- विद्यालयों को मान्यता

विद्यालयों की मान्यता को लेकर आयोग ने निम्न सुझाव दिए

(i) माध्यमिक विद्यालयों को मान्यता देने में नियमों का कड़ाई से पालन किया जाना चाहिए तथा माध्यमिक विद्यालय को मान्यता तभी मिलनी चाहिए जब वह बोर्ड द्वारा दी गयी सभी शर्तें विद्यालय में लागू करे।

(ii) वे प्रबंधन समितियां या माध्यमिक विद्यालय जो मान्यता प्राप्त करने के पश्चात भी विद्यालय को ठीक से चलाने में असमर्थ रहते हैं या विफल होते हैं उन्हें सर्वप्रथम चेतावनी देनी चाहिए और यदि चेतावनी के पश्चात भी उनमें कोई परिवर्तन ना आए तो उनकी मान्यता रद्द कर देनी चाहिए।

4- विद्यालयों की देखरेख

आयोग द्वारा निजी व सरकारी विद्यालयों में नियमित रूप से पर्यवेक्षण किए जाने के पश्चात आयोग ने 4 सुझाव दिए

(i) विद्यालयों की देखरेख के लिए पर्याप्त संख्या में निरीक्षकों की नियुक्ति की जानी चाहिए।

(ii) विद्यालय के निरीक्षकों एवं माध्यमिक विद्यालयों के प्रधानाचार्यों के अलावा अनुभवी शिक्षकों को भी पर्यवेक्षण समितियों के सदस्य के रूप में नियुक्त किया जाना चाहिए।

(iii) विद्यालयों की देखरेख का एक निश्चित समय अंतराल होना चाहिए।

(iv) पर्यवेक्षण समितियों को विद्यालय के गुण व अवगुण को इंगित कर उनकी कमियों को दूर करने के लिए पर्याप्त सुझाव देने चाहिए।

माध्यमिक शिक्षा के संगठन से संबंधित मुदालियर आयोग के सुझाव

1- प्राथमिक शिक्षा के बाद माध्यमिक शिक्षा शुरू होनी चाहिए।

2- माध्यमिक शिक्षा 11 से 17 वर्ष के बच्चों के लिए होनी चाहिए तथा इसकी अवधि 7 वर्ष की होनी चाहिए।

3- माध्यमिक शिक्षा को दो भागों में बांट देना चाहिए-

i) जूनियर माध्यमिक शिक्षा (3 वर्ष )और

ii) उच्चतर माध्यमिक शिक्षा (4 वर्ष )।

4- ग्रामीण विद्यालयों में कृषि शिक्षा की व्यवस्था होनी चाहिए।

5- कुशल श्रमिकों की मांग के चलते बड़े-बड़े शहरों में पॉलिटेक्निक कॉलेज खोले जाने चाहिए।

6- उद्योग तथा पॉलिटेक्निक कॉलेज के मध्य अधिक अंतर ना होने के कारण दोनों को एक दूसरे को सहयोग देना चाहिए।

7- शारीरिक एवं मानसिक रूप से विकलांग बच्चों के लिए विशेष विद्यालय खोले जाने चाहिए।

8- बालिकाओं के लिए अलग से विद्यालय खोले जाने चाहिए।

माध्यमिक विद्यालयों के लक्ष्यों से संबंधित मुदालियर आयोग के सुझाव

आयोग का मानना था कि वर्तमान शिक्षा बच्चों को वास्तविक जीवन से परिचित नहीं करा पा रहा है। अतः आयोग ने विद्यालयों के लिए चार मुख्य लक्ष्य बनाए जो की निम्नवत हैं-

1- जनतांत्रिक नागरिकता का विकास

2- व्यावसायिक कौशल का विकास करना

3- व्यक्तित्व का विकास करना

4- नेतृत्व का विकास करना

माध्यमिक विद्यालय के पाठ्यक्रम से संबंधित मुदालियर आयोग के सुझाव

माध्यमिक शिक्षा के निर्माण के लिए आयोग ने निम्नलिखित बुनियादी सिद्धांतों पर जोर दिया

1- पाठ्यक्रम वास्तविक जीवन से संबंधित होना चाहिए।

2- पाठ्यक्रम व्यापक एवं लचीला होना चाहिए ताकि बालक अपनी रुचि एवं क्षमता के अनुसार विषयों का चयन कर सके।

3- पाठ्यक्रम में कुछ ऐसे विषय भी शामिल किए जाने चाहिए जिनका प्रयोग विद्यार्थी अपने अवकाश के दिनों में कर सके।

4- पाठ्यक्रम को अलग-अलग विषयों में विभाजित नहीं किया जाना चाहिए लेकिन सभी विषय एवं पाठ्यक्रम से संबंधित गतिविधियां एक दूसरे से परस्पर सम्बंधित होनी चाहिए।

शिक्षण विधियों से संबंधित मुदालियर आयोग के सुझाव

आयोग द्वारा मौजूदा शिक्षण विधियों की आलोचना कर उनके सुधार के लिए निम्नलिखित उपाय बताए गए-

1- रटने की शिक्षा को हटाकर समझने की शिक्षा पर जोर देना चाहिए, इसके लिए बच्चों को स्वतंत्र विचार और निर्णय लेने का अवसर प्रदान किया जाना चाहिए।

2- शिक्षण में बच्चों की सक्रिय भागीदारी होनी चाहिए। क्रिया विधि या प्रोजेक्ट विधि का प्रयोग करना चाहिए।

3- शिक्षण को रोचक व प्रभावी बनाने के लिए श्रवण-दृश्य सामग्री का प्रयोग किया जाना चाहिए जिससे तथ्य सुस्पष्ट हो सके।

4- ऐसी शिक्षण विधियों का प्रयोग करना चाहिए जो कि हर प्रकार के छात्रों के समझने के लिए लाभदायक हो।

5- स्व-अध्ययन को प्रोत्साहित करना चाहिए।

माध्यमिक स्तर पर पुस्तकों से संबंधित मुदालियर आयोग के सुझाव

आयोग द्वारा पुस्तकों से संबंधित सुझाव निम्नलिखित थे-

1- प्रत्येक प्रांत में एक पाठ्य-पुस्तक समिति का गठन किया जाना चाहिए जिसका कार्य अच्छी पुस्तकों को तैयार करना तथा उनका चयन करना हो।

2- केंद्र सरकार द्वारा एक स्वतंत्र संस्थान तैयार किया जाना चाहिए जिसमें पाठ्यपुस्तक के चित्र तथा उसको बनाने की तकनीकीयों का प्रशिक्षण दिया जाए।

3- पुस्तकों के लगातार परिवर्तन को हतोत्साहित किया जाना चाहिए।

4- पाठ्य-पुस्तक में कोई भी ऐसा गद्यांश या कथन ना हो जो किसी विशेष समुदाय को ठेस पहुंचाए।

माध्यमिक विद्यालय के शिक्षकों से संबंधित मुदालियर आयोग के सुझाव

आयोग द्वारा शिक्षकों से संबंधित सुझावों को 3 भागों में विभक्त किया जा सकता है। प्रशिक्षण संबंधी सुझाव, नियुक्ति संबंधी सुझाव एवं वेतनमान एवं सेवा शर्तों से संबंधित सुझाव।

1- प्रशिक्षण संबंधी सुझाव

(i) माध्यमिक शिक्षा के लिए शिक्षक की दो श्रेणियां होना आवश्यक है। जूनियर माध्यमिक कक्षाओं के लिए शिक्षक एवं उच्च माध्यमिक कक्षाओं के लिए शिक्षक।

(ii) जूनियर माध्यमिक शिक्षकों के लिए शिक्षक प्रशिक्षण विद्यालय राज्य के शिक्षा विभाग से संबद्ध होने चाहिए और प्रवेश के लिए न्यूनतम योग्यता उच्चतर माध्यमिक होनी चाहिए।

(iii) माध्यमिक विद्यालय के शिक्षकों के लिए शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालयों को विश्वविद्यालयों से संबद्ध किया जाना चाहिए तथा इनको प्राप्त करने की न्यूनतम योग्यता स्नातक होनी चाहिए।

(iv) जो उम्मीदवार सक्षम हो उसी को शिक्षक प्रशिक्षण विद्यालय और महाविद्यालय में प्रवेश मिलना चाहिए।

(v) शिक्षक प्रशिक्षण समय-समय पर रिफ्रेशर कार्यक्रम आयोजित किए जाने चाहिए।

(vi) एम.एड. में केवल उन छात्रों को प्रवेश मिलना चाहिए जिन्होंने बी.एड. किया हो तथा जिनको न्यूनतम 3 वर्ष के अध्यापन का अनुभव हो।

2- शिक्षक नियुक्ति संबंधी सुझाव

(i) शिक्षकों की नियुक्ति से संबंधी नियम तैयार किया जाना चाहिए।

(ii) शिक्षकों की नियुक्ति के लिए सामान्य नियम तैयार किये जाने चाहिए।

(iii) शिक्षकों की नियुक्ति के लिए एक चयन समिति बनाई जानी चाहिए जिसका पदेन किसी गैर सरकारी विद्यालय का प्रधानाचार्य हो।

3- वेतनमान एवं सेवा शर्तों से संबंधित सुझाव

(i) शिक्षकों के वेतनमान के लिए एक विशेष समिति का गठन किया जाना चाहिए तथा बढ़ती हुई महंगाई को देखते हुए वेतनमान में परिवर्तन किया जाना चाहिए।

(ii) समान योग्यता रखने वाले शिक्षकों का वेतनमान समान होना चाहिए।

(iii) प्रधानाचार्य को उच्च वेतनमान दिया जाना चाहिए।

(iv) हर प्रांत के शिक्षकों को बीमा, पेंशन आदि की सुविधाएं दी जानी चाहिए।

(v) शिक्षकों के बच्चों को माध्यमिक स्तर तक निःशुल्क शिक्षा दी जानी चाहिए।

(vi) शिक्षकों को निःशुल्क चिकित्सा सुविधा दी जानी चाहिए।

(vii) शिक्षकों को ट्यूशन देने की मनाही होनी चाहिए।

माध्यमिक विद्यालयों से संबंधित मुदालियर आयोग के सुझाव

1- हर माध्यमिक विद्यालयों में सुसज्जित पुस्तकालय एवं प्रयोगशाला होनी चाहिए।

2- हर विद्यालय में 500 से 700 तक विद्यार्थी होने चाहिए तथा उनके लिए उपयुक्त भवन एवं पर्याप्त फर्नीचर तथा अन्य आवश्यक उपकरण होने चाहिए।

3- माध्यमिक विद्यालयों में पौस्टिक मध्याह्न भोजन की सुविधा तथा नियमित रूप से छात्रों के स्वास्थ्य की जांच कराई जानी चाहिए।

4- विद्यालय में प्रति सप्ताह 35 घंटे कार्य होना चाहिए तथा एक सत्र में कार्य दिवसों की अवधि 200 दिन से कम नहीं होनी चाहिए।

5- विद्यालय में 160 दिन से अधिक की छुट्टी नहीं होनी चाहिए। जिनमें 2 महीने का शीतकालीन या फिर ग्रीष्म काल अवकाश तथा 10 दिन की अवधि के दो छोटे अवकाश एवं राष्ट्रीय अवकाश सम्मिलित हों।

छात्रों के स्वास्थ्य से संबंधित मुदालियर आयोग के सुझाव

1- सभी प्रांतों में विद्यालय स्वास्थ्य सेवा योजना शुरु होनी चाहिए।

2- छात्रावास में पौष्टिक भोजन का प्रबंध होना चाहिए।

3- सामान्य रोगों के लिए छात्रों का निःशुल्क उपचार किया जाना चाहिए।

4- साल में कम से कम एक बार छात्रों के स्वास्थ्य की जांच की जानी चाहिए।

शैक्षिक एवं व्यवसायिक मार्गदर्शन तथा परामर्श के मुदालियर आयोग के सुझाव

1- सभी प्रांतों में एक शैक्षिक एवं व्यवसायिक मार्गदर्शन ब्यूरो स्थापित किए जाने चाहिए।

2- छात्रों को उनके दृष्टिकोण, योग्यता, क्षमता, रुचियां एवं व्यक्तिगत-भिन्नता के आधार पर मार्गदर्शन प्रदान किया जाना चाहिए।

3- भविष्य की संभावनाओं को ध्यान में रखते हुए शैक्षिक व व्यवसायिक परामर्श देने चाहिए।

माध्यमिक विद्यालय की परीक्षाओं से संबंधित मुदालियर आयोग के सुझाव

1- माध्यमिक शिक्षा के अंत में बाहरी शिक्षा को आयोजित किया जाना चाहिए।

2- वस्तुनिष्ठ प्रकार के प्रश्नों को भी परीक्षा में शामिल किया जाना चाहिए।

3-मूलयांकन के परिणामों के लिए ग्रेड पद्धति का प्रयोग किया जाना चाहिए।

महिला शिक्षा से संबंधित मुदालियर आयोग के सुझाव

1- महिलाओं को पुरुषों के समान किसी भी प्रकार की शिक्षा को लेने का अधिकार मिलना चाहिए।

2- महिलाओं के लिए गृह विज्ञान विषय की व्यवस्था कराई जानी चाहिए।

3- आवश्यकता के अनुसार बालिकाओं के लिए अलग से विद्यालय खोले जाने चाहिए।

धार्मिक एवं नैतिक शिक्षा से संबंधित मुदालियर आयोग के सुझाव

1- धार्मिक एवं नैतिक शिक्षा को माध्यमिक शिक्षा में अनिवार्य नहीं रखना चाहिए।

2- धार्मिक शिक्षा को केवल एक विकल्प के रूप में अभिभावकों की पूर्व सहमति से रखा जा सकता है।

माध्यमिक स्तर पर व्यावसायिक शिक्षा से संबंधित मुदालियर आयोग के सुझाव

1- किसी भी एक शिल्पकला को माध्यमिक शिक्षा में अनिवार्य किया जाना चाहिए।

2- माध्यमिक विद्यालयों को बहुउद्देशीय विद्यालयों में परिवर्तित किया जाना चाहिए।

उपसंहार

मुदालियर आयोग द्वारा माध्यमिक शिक्षा से संबंधित कई कमियां इंगित करने के बाद उसमें सुधार लाने क लिये कई सुझाव दिए गए। आयोग ने बच्चों के हित के बारे में सोच कर उनके पक्ष में कई अच्छे-अच्छे सुझाव दिए। बच्चों की रूचि, क्षमता एवं उनकी योग्यता का मुख्य ध्यान रखा गया है साथ ही साथ बच्चों के स्वास्थ्य सम्बन्धी एवं पौस्टिक भोजन के बारे में भी सुझाव दिए गए हैं।

बच्चों के अध्ययन के साथ-साथ शिक्षकों के स्वास्थ्य एवं वेतनमान को लेकर भी कई सुझाव दिए गए हैं।आयोग द्वारा बच्चों के भविष्य के बारे में सोच कर माध्यमिक शिक्षा में व्यावसायिक शिक्षण के विषय भी रखे जाने का सुझाव दिया गया है जिस से बच्चे अपने भविष्य में सम्मान की जिंदगी बसर कर सकें।

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