Maanchitrkla

मानचित्रकला (Maanchitrkla)

मानचित्रकला (Maanchitrkla) धरातल पर स्थित विभिन्न स्थानों या बिंदुओं के मध्य के सम्बन्ध (उनके बीच की दूरी एवं उन दूरियों के अनुसार विभिन्न स्थानों या बिंदुओं की दिशाओं के आधार पर उनके मध्य बनने वाला कोण) को मापनी की सहायता से उन्हें किसी समतल स्थान या कागज़ आदि में सही अनुपात में दर्शाना मानचित्रण कहलाता है।

अकसर देखा गया है कि जब हम या कोई भी व्यक्ति किसी से किसी का पता पूछता है तो बताने वाला पते को कुछ इस प्रकार से बताता है – आप आगे जाइये, आगे जाकर आपके सीधे हाथ में एक मोड़ आएगा, वहां मुड कर आप 100 मीटर चलियेगा तो बाएं हाथ में जो घर आएगा वही वो जगह है जहां आपको जाना है।

या वह व्यक्ति आपको मिटटी या कागज में रास्ता बना कर दिशाओं के साथ उस स्थान का पता बता देगा। इस क्रिया को मानचित्रण कहते हैं। इस क्रिया से हमें यह पता चलता है कि मानचित्रण मनुष्य का एक जन्मजात गुण है जिस गुण के द्वारा वह बिना किसी अध्ययन के किसी भी स्थान का मानचित्रण कर लेता है।
मानचित्र के इतिहास की बात करें तो हम यह कह सकते हैं कि मानचित्रण उतना ही पुराना है जितना की मनुष्य का इतिहास।

मानचित्रकला (Maanchitrkla) की परिभाषा

मानचित्रकला (Maanchitrkla) के सम्बन्ध में कई विद्वानों एवं भूगोलवेत्ताओं ने अपने मत एवं परिभाषाएं दी हैं जो की निम्नवत्त हैं –

एफ. जे. मौंकहाउस के अनुसार,
“मानचित्रकला में धरातल के वास्तविक सर्वेक्षण से मानचित्र मुद्रण तक मानचित्र के प्रक्रमों की सम्पूर्ण श्रंखला सम्मिलित होती है।”

इरविन रेज़ के अनुसार,
“सर्वेक्षक धरातल की माप करता है, मानचित्रकार इन मापों के एकत्रित करके उन्हें मानचित्र पर प्रदर्शित करता है तथा भूगोलवेत्ता मानचित्र पर प्रदर्शित तथ्यों का अर्थ निकालता है।”

एल. डी. स्टाम्प के अनुसार,
“मानचित्र रचना की कला तथा वह विज्ञान जिस पर यह मानचित्रण आधारित है, मानचित्रकला कहलाता है। यह एक ऐसा विषय है जिसमें धरातल के भौतिक लक्षणों का चित्र प्रस्तुत करने के लिए खगोलज्ञों व गणितज्ञों की उपलब्धियों को सर्वेक्षकों तथा अन्वेषकों की उपलब्धियों से जोड़ दिया जाता है।”

मानचित्रकला (Maanchitrkla) का इतिहास

मानचित्रकला (Maanchitrkla) में होने वाले क्रमिक परिवर्तन को मानचित्रकला का इतिहास कहते हैं।

मानव की उत्पत्ति से वर्तमान समय तक मानचित्रण में कई परिवर्तन आये है। प्राचीन काल में मानचित्रण केवल आखेट एवं अपने रहने के स्थान तक सीमित था। समय के साथ-साथ मानचित्र बनाने की विधियों एवं तकनीकियों में परिवर्तन आते रहे एवं मानचित्रकला में सुधार आता रहा।

अगर मानचित्र कला की उत्पत्ति या प्रारंभिक समय की बात करें तो मानचित्र कला को हम तीन अवस्थाओं या कालों में विभाजित कर सकते हैं।

1. प्राचीन काल (400 ई के पश्चात)

2. मध्य काल (400 से 1700)

3. आधुनिक काल (1700 से वर्तमान समय तक)

बेबीलोन (Babylonian map)

विश्व का प्रथम मानचित्र बनाने का श्रेय एनेक्सीमेण्डर को प्राप्त है। उन्होंने 600 ई. पू. में विश्व का प्रथम मानचित्र बनाया। संसार का सबसे प्राचीनतम मानचित्र बेबीलोन को माना जाता है। मिश्र के ट्यूरिन पैपीरम को भी विश्व के प्राचीनतम मानचित्र में गिना जाता है।

मानचित्र कला में हैरोडोटस मोहदय (485-425 ई. पू.) ने संसार मानचित्र में भूमध्य सागर के समीप स्थित यूरोप, एशिया तथा अफ्रीका के भागों को अलग-अलग प्रदर्शित किया था। 1743 ई. में सर्वप्रथम क्लेयरॉट महोदय ने पृथ्वी के स्फेरिकल आकर को सैद्धांतिक रूप से सिद्ध किया था।

इरविन रेज़ ने अपनी पुस्तक जनरल कार्टोग्राफी (General Cartography) में एक मानचित्रकार की परिभाषा देते हुए कहा है कि एक मानचित्रकार 50 % भूगोलवेत्ता, 30 % कलाकार, 10% गणितज्ञ तथा 10% अन्य विषयों का ज्ञाता होता है।

कुछ महत्वपूर्ण तथ्य

  • संसार की राष्ट्रीय मानचित्रावली – स्कॉटलैण्ड की मानचित्रावली (जे. जी. बार्थो लोमेव ने 1865 में प्रकाशित किया)
  • भारतीय सर्वेक्षण की स्थापना – मेजर जनरलरेनेल के नेतृत्व में (1769)
  • बेबीलोन – संसार का सबसे प्राचीनतम मानचित्र
  • विश्व का प्रथम मानचित्र बनाने का श्रेय एनेक्सीमेण्डर को प्राप्त है
  • पृथ्वी के स्फेरिकल आकर को सैद्धांतिक रूप – क्लेयरॉट महोदय (1743)

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